इंदौर खंडपीठ ने संघ की गतिविधियों में केंद्रीय कर्मचारियों पर प्रतिबंध हटाने की मांग वाली याचिका का निराकरण टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा कि कई केंद्रीय अधिकारी व कर्मचारी जिनकी आकांक्षा आरएसएस में शामिल होकर देश सेवा करने की थी वे प्रतिबंध की वजह से ऐसा नहीं कर सके।यह भी दुखद है कि प्रतिबंध तब हटाया गया जब याचिका के माध्यम से यह बात सरकार के ध्यान में लाई गई।
मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की गतिविधियों में केंद्रीय कर्मचारियों के शामिल होने पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग वाली याचिका का निराकरण करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि खेद की बात है कि केंद्र सरकार को अपनी गलती का अहसास होने और इसे दुरुस्त करने में पांच दशक लग गए।
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रतिबंध को लेकर पूर्व में जारी आदेशों में नौ जुलाई 2024 को जो संशोधन किया गया है, उसकी सूचना केंद्र सरकार के सभी विभाग अपनी वेबसाइट के मुख्य पेज पर प्रमुखता से जारी करें। कोर्ट ने उस याचिका का निराकरण कर दिया, जो केंद्र सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों के आरएसएस की गतिविधियों में शामिल होने पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ दायर की गई थी। मामले से जुड़े सभी पक्षों के तर्क सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो गुरुवार शाम को जारी हुआ।
हाई कोर्ट ने कहा कि कई केंद्रीय अधिकारी व कर्मचारी, जिनकी आकांक्षा आरएसएस में शामिल होकर देश सेवा करने की थी, वे प्रतिबंध की वजह से ऐसा नहीं कर सके। यह भी दुखद है कि प्रतिबंध तब हटाया गया, जब याचिका के माध्यम से यह बात सरकार के ध्यान में लाई गई।
18 पेज के फैसले में कोर्ट ने कहा कि आरएसएस की गतिविधियों में केंद्रीय कर्मचारियों के शामिल होने पर प्रतिबंध से आम नागरिकों के मौलिक अधिकार का भी हनन हो रहा था। प्रतिबंध लगाने के पहले न कोई सर्वे किया गया, न तथ्यों की जांच की गई। बगैर किसी ठोस आधार के प्रतिबंध का निर्णय लिया गया था।
संगठन की सदस्यता स्वैच्छिक है। संगठन धार्मिक, सामाजिक, परोपकारी, शैक्षिक गतिविधियां संचालित करता है। इसमें शामिल होने से किसी को कैसे रोका जा सकता है? राहत की बात है कि केंद्र सरकार को गलती का अहसास हुआ और उसने याचिका लंबित रहने के दौरान ही नौ जुलाई को पूर्व में जारी आदेशों में संशोधन किया। भविष्य में ऐसा करने से पहले बारीकी से जांच की जानी चाहिए।
यह था मामला
केंद्र के सेवानिवृत्त अधिकारी इंदौर निवासी पुरुषोत्तम गुप्ता ने मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के समक्ष याचिका दायर कर कहा था कि आरएसएस द्वारा की जाने वाली सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों से प्रभावित होकर वह एक सक्रिय सदस्य के रूप में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने वर्ष 1966 से ही केंद्रीय कर्मचारियों (जिनमें सेवानिवृत्त कर्मचारी भी शामिल हैं) के शामिल होने पर प्रतिबंध लगा रखा है। जबकि, कई राज्यों में राज्य कर्मचारियों के लिए (जिनमें मप्र भी शामिल है) ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।
प्रतिबंध की वजह से केंद्रीय कर्मचारी इस संगठन के माध्यम से देश सेवा नहीं कर पा रहे हैं। याचिका की सुनवाई के दौरान ही केंद्र सरकार की तरफ से एडवोकेट हिमांशु जोशी ने कोर्ट में जानकारी दी थी कि केंद्र ने वर्ष 1966, 1975 और 1980 में पारित आदेशों में संशोधन कर दिया है और इस तरह का प्रतिबंध हटा दिया है।